ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई पर सब्सिडी: रेगिस्तान में पानी बचाकर खेती कैसे करें

ड्रिप सिंचाई सब्सिडी — मरुधरा किसान
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बीकानेर में खेती की सबसे बड़ी सीमा ज़मीन नहीं, पानी है। नहर का पानी बारी से आता है, ट्यूबवेल का पानी कई जगह खारा है, और बारिश का कोई भरोसा नहीं।

ऐसे में सवाल यह नहीं है कि और पानी कहां से लाएं। सवाल यह है कि जो पानी है, उससे कितना ज़्यादा काम लिया जा सकता है। सूक्ष्म सिंचाई इसी का जवाब है।

परंपरागत सिंचाई में पानी कहां जाता है

खुली क्यारी या बाढ़ सिंचाई में पानी का बड़ा हिस्सा फसल तक पहुंचता ही नहीं:

  • रेतीली मिट्टी में नीचे रिसकर जड़ क्षेत्र से बाहर चला जाता है
  • खुली सतह से भाप बनकर उड़ जाता है
  • नालियों और मेड़ों में बहकर बर्बाद होता है
  • खेत के ऊंचे-नीचे हिस्सों में असमान बंटता है — कहीं ज़्यादा, कहीं कम

सूक्ष्म सिंचाई में पानी सीधे जड़ों तक पहुंचता है, इसलिए यह बर्बादी बहुत कम हो जाती है।

ड्रिप या स्प्रिंकलर — कौन सा चुनें

यह सबसे ज़रूरी फ़ैसला है और यह पूरी तरह आपकी फसल पर निर्भर करता है।

ड्रिप सिंचाईस्प्रिंकलर
कैसे काम करती हैबूंद-बूंद सीधे जड़ मेंफव्वारे की तरह ऊपर से
किन फसलों के लिएसब्ज़ी, कपास, बाग़वानी, अनार, किन्नूगेहूं, सरसों, चना, मूंगफली, जीरा
पानी की बचतसबसे ज़्यादाअच्छी
खरपतवारकम, क्योंकि बीच की ज़मीन सूखी रहती हैसामान्य
शुरुआती लागतज़्यादाअपेक्षाकृत कम
रखरखावज़्यादा ध्यान चाहिएआसान

सीधा नियम यह है — कतार में दूर-दूर लगने वाली फसल के लिए ड्रिप, घनी बोई जाने वाली फसल के लिए स्प्रिंकलर।

बीकानेर संभाग में सरसों, चना, गेहूं और मूंगफली का रक़बा ज़्यादा है, इसलिए यहां स्प्रिंकलर का चलन ज़्यादा है। बाग़वानी और सब्ज़ी वाले किसानों के लिए ड्रिप ज़्यादा उपयोगी रहता है।

फ़ायदे सिर्फ़ पानी की बचत तक सीमित नहीं

  1. उसी पानी में ज़्यादा रक़बा — जिस पानी से पहले एक बीघा सिंचता था, उससे कहीं ज़्यादा ज़मीन सींची जा सकती है
  2. खाद पानी के साथ — फर्टिगेशन के ज़रिए घुलनशील खाद सीधे जड़ों तक पहुंचती है, जिससे खाद की बर्बादी घटती है
  3. खरपतवार कम — ड्रिप में बीच की ज़मीन सूखी रहती है, इसलिए खरपतवार कम उगता है
  4. मज़दूरी की बचत — पानी लगाने के लिए रातभर खेत में रुकने की ज़रूरत नहीं
  5. बेहतर पैदावार — जड़ क्षेत्र में नमी एक समान रहने से पौधे पर तनाव कम पड़ता है
  6. ऊबड़-खाबड़ ज़मीन भी सिंचित — जहां क्यारी बनाना मुश्किल है, वहां भी काम करती है

सब्सिडी कैसे मिलती है

सूक्ष्म सिंचाई को बढ़ावा देने के लिए केंद्र और राज्य सरकार मिलकर सहायता देती हैं। लघु और सीमांत किसानों को आमतौर पर ज़्यादा दर से सब्सिडी मिलती है।

सब्सिडी का प्रतिशत, अधिकतम सीमा और पात्रता की शर्तें समय-समय पर बदलती रहती हैं, इसलिए आवेदन से पहले मौजूदा दर की पुष्टि ज़रूर कर लें।

ज़रूरी दस्तावेज़

  • जनाधार और आधार कार्ड
  • ज़मीन की जमाबंदी की नकल
  • सिंचाई स्रोत का प्रमाण — नहर, कुआं या ट्यूबवेल
  • बैंक पासबुक की प्रति
  • जाति प्रमाण पत्र, अगर आरक्षित श्रेणी में हैं
  • मिट्टी और पानी की जांच रिपोर्ट, अगर मांगी जाए

आवेदन की प्रक्रिया

  1. नज़दीकी ई-मित्र केंद्र या राज किसान साथी पोर्टल से ऑनलाइन आवेदन करें
  2. दस्तावेज़ अपलोड करके रसीद लें
  3. प्रशासनिक स्वीकृति का इंतज़ार करें — यह सबसे अहम क़दम है
  4. स्वीकृति मिलने के बाद ही अधिकृत फ़र्म से सामान ख़रीदें और संयंत्र लगवाएं
  5. कृषि विभाग के अधिकारी मौक़े पर आकर सत्यापन करते हैं
  6. सत्यापन के बाद सब्सिडी सीधे बैंक खाते में आती है

यह ग़लती कभी न करें: प्रशासनिक स्वीकृति मिलने से पहले संयंत्र ख़रीद लेना। पहले ख़रीदे गए सामान पर सब्सिडी नहीं मिलती, चाहे बाक़ी सब कागज़ पूरे हों। हर साल बहुत से किसान इसी वजह से सब्सिडी से वंचित रह जाते हैं।

इसी तरह, हमेशा अधिकृत विक्रेता से ही ख़रीदें और पक्का बिल लें। अनधिकृत फ़र्म से ख़रीदा गया सामान सब्सिडी के लिए मान्य नहीं होता।

रखरखाव — यहीं ज़्यादातर सिस्टम ख़राब होते हैं

संयंत्र लग जाना आधा काम है। असली बात उसे चलाते रहना है।

  • फ़िल्टर की सफ़ाई नियमित करें। यह सबसे ज़रूरी काम है और सबसे ज़्यादा टाला जाता है
  • ड्रिपर जाम होने पर समय-समय पर एसिड ट्रीटमेंट करवाएं। खारे पानी वाले इलाक़ों में यह और ज़रूरी हो जाता है
  • लीकेज तुरंत ठीक करें — एक छोटा छेद भी पूरे सिस्टम का दबाव गिरा देता है
  • सीज़न ख़त्म होने पर पाइप साफ़ करके, धूप से बचाकर रखें
  • स्प्रिंकलर के नोज़ल समय-समय पर जांचें — घिसा हुआ नोज़ल पानी असमान फेंकता है

खारे पानी वाले इलाक़ों में ड्रिप में लवण जमने की समस्या ज़्यादा आती है। वहां संयंत्र लगवाने से पहले पानी की जांच ज़रूर करवाएं और विक्रेता को रिपोर्ट दिखाकर उपयुक्त फ़िल्टर लगवाएं।

खेत तलाई के साथ मिलाकर सोचिए

बीकानेर के हालात में सबसे अच्छा संयोजन यह बनता है — बारिश का पानी खेत तलाई में जमा कीजिए, और उसी पानी को सूक्ष्म सिंचाई से इस्तेमाल कीजिए।

खेत तलाई पर भी सरकार सहायता देती है। दोनों को साथ लेने पर बारिश का पानी भी बचता है और उसका इस्तेमाल भी कई गुना कारगर हो जाता है।

योजनाओं के नाम, सब्सिडी की दरें और आवेदन पोर्टल बदलते रहते हैं। आवेदन से पहले राजस्थान कृषि विभाग के कार्यालय, कृषि पर्यवेक्षक या आधिकारिक पोर्टल से मौजूदा जानकारी की पुष्टि ज़रूर करें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

ड्रिप और स्प्रिंकलर में से कौन सा बेहतर है?

यह फसल पर निर्भर करता है। कतार में बोई जाने वाली और दूर-दूर लगने वाली फसलों जैसे सब्ज़ी, कपास और बाग़वानी के लिए ड्रिप बेहतर है। घनी बोई जाने वाली फसलों जैसे गेहूं, सरसों, चना और मूंगफली के लिए स्प्रिंकलर ज़्यादा उपयुक्त रहता है।

सूक्ष्म सिंचाई पर कितनी सब्सिडी मिलती है?

सब्सिडी का प्रतिशत किसान की श्रेणी और सरकार की मौजूदा अधिसूचना पर निर्भर करता है। लघु और सीमांत किसानों को आमतौर पर ज़्यादा दर से सहायता मिलती है। मौजूदा दर कृषि विभाग या राज उद्यान पोर्टल से पुष्टि करें।

ड्रिप सिस्टम में सबसे आम समस्या क्या है?

ड्रिपर का जाम हो जाना। खारे पानी में जमा होने वाले लवण और पानी में मौजूद महीन कण ड्रिपर बंद कर देते हैं। इसीलिए फ़िल्टर की नियमित सफ़ाई और समय-समय पर एसिड ट्रीटमेंट ज़रूरी है।

संपादक

रामनिवास चौधरी

रामनिवास चौधरी बीकानेर के रहने वाले हैं और पिछले 12 साल से कृषि पत्रकारिता कर रहे हैं। वे सरकारी योजनाओं को आसान भाषा में समझाने और किसानों तक सही जानकारी पहुंचाने का काम करते हैं। श्री गंगानगर और बीकानेर की मंडियों पर इनकी गहरी पकड़ है।

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