ऊंट पालन राजस्थान में: घटती संख्या, सरकारी मदद और ऊंटनी के दूध का कारोबार

ऊंट पालन — मरुधरा किसान
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राजस्थान की पहचान में ऊंट का जो स्थान है, वह किसी और पशु का नहीं। रेत के धोरों पर चलता ऊंट इस प्रदेश की तस्वीर का हिस्सा है। इसे राज्य पशु का दर्जा भी मिला हुआ है।

लेकिन ज़मीनी सच्चाई चिंताजनक है — राजस्थान में ऊंटों की संख्या लगातार घट रही है। पशुगणना के आंकड़े हर बार पिछली बार से कम रहे हैं।

संख्या घट क्यों रही है

वजह भावनात्मक नहीं, आर्थिक है।

पहले ऊंट परिवहन का साधन था, खेत जोतने के काम आता था, और माल ढोता था। आज ट्रैक्टर और गाड़ियां उसकी जगह ले चुकी हैं। ऊंट की आमदनी वाली भूमिका ख़त्म हो गई, लेकिन उसके रखरखाव का ख़र्च बना रहा।

इसके साथ कुछ और वजहें जुड़ीं:

  • चराई की खुली ज़मीन घटी — गोचर और ओरण की ज़मीनें सिकुड़ती गईं
  • युवा पीढ़ी की अरुचि — ऊंट पालन मेहनत का काम है और आमदनी अनिश्चित
  • पशुपालकों की आर्थिक मजबूरी — जब पशु कमाई न दे, तो उसे रखना मुश्किल हो जाता है
  • स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच — ऊंट के लिए विशेषज्ञ पशु चिकित्सा हर जगह उपलब्ध नहीं

ऊंटनी का दूध — नई उम्मीद

पिछले कुछ सालों में एक नया रास्ता खुला है, और यही ऊंट पालन को दोबारा व्यावहारिक बना सकता है।

ऊंटनी के दूध की मांग बढ़ी है। इसकी संरचना गाय के दूध से अलग होती है और इसे पचाने में अपेक्षाकृत आसान माना जाता है। शहरी बाज़ार में इसकी अच्छी क़ीमत मिलती है।

आज ऊंटनी के दूध से ये उत्पाद बन रहे हैं:

  • ताज़ा दूध, शहरी ग्राहकों के लिए
  • दूध का पाउडर — जिसकी शेल्फ़ लाइफ़ लंबी होती है और जो दूर तक भेजा जा सकता है
  • चॉकलेट, कुल्फ़ी और मिठाइयां
  • साबुन और त्वचा की देखभाल के उत्पाद

बीकानेर में स्थित राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केंद्र इस क्षेत्र का प्रमुख संस्थान है। यहां ऊंट की नस्लों, उनके स्वास्थ्य और ऊंटनी के दूध पर शोध होता है। ऊंट पालन में रुचि रखने वालों के लिए यह जानकारी का सबसे भरोसेमंद स्रोत है।

व्यावहारिक चुनौती

दूध का बाज़ार अभी भी सीमित है। ताज़ा दूध जल्दी ख़राब होता है और हर गांव से शहर तक पहुंचाना आसान नहीं। इसलिए संगठित संग्रहण और प्रसंस्करण के बिना यह कारोबार बड़े पैमाने पर नहीं चल सकता।

जहां सहकारी समितियां या दूध संग्रहण केंद्र बने हैं, वहां पशुपालकों को नियमित आमदनी मिल रही है। अकेले पशुपालक के लिए बाज़ार तक पहुंचना मुश्किल रहता है — इसलिए समूह बनाकर काम करना ज़्यादा व्यावहारिक रास्ता है।

राजस्थान की प्रमुख ऊंट नस्लें

नस्लमुख्य क्षेत्रख़ासियत
बीकानेरीबीकानेर, चूरू, श्रीगंगानगरभारवाहक क्षमता अच्छी, मज़बूत ढांचा
जैसलमेरीजैसलमेर, बाड़मेरदौड़ने में तेज़, अपेक्षाकृत हल्का शरीर
मेवाड़ीउदयपुर, राजसमंदपहाड़ी इलाक़ों के लिए उपयुक्त, दूध अच्छा
कच्छी-खरईगुजरात सीमावर्ती क्षेत्रखारे पानी और दलदली इलाक़े में सक्षम

ऊंट पालन की व्यावहारिक बातें

आहार

ऊंट की सबसे बड़ी ख़ूबी यह है कि वह उन झाड़ियों और पेड़ों की पत्तियां खा लेता है जिन्हें दूसरे पशु नहीं खाते — खेजड़ी, कैर, बबूल, नीम, आक।

  • चराई सबसे स्वाभाविक और सस्ता तरीक़ा है
  • दुधारू ऊंटनी को अतिरिक्त दाना और खनिज मिश्रण देना ज़रूरी है
  • नमक ज़रूर दें
  • ऊंट कम पानी में रह सकता है, लेकिन दुधारू ऊंटनी को पर्याप्त पानी चाहिए

आवास

ऊंट को बंद जगह पसंद नहीं। खुली, छायादार जगह चाहिए जहां वह बैठ सके। ज़मीन सूखी रहनी चाहिए — लगातार गीली ज़मीन से पैरों में समस्या होती है।

स्वास्थ्य

  • सर्रा (Surra) — ऊंट की सबसे गंभीर बीमारियों में से एक, मक्खी से फैलती है
  • खुजली और चर्म रोग — नियमित जांच ज़रूरी
  • आंतरिक परजीवी — समय-समय पर कृमिनाशक दवा दें
  • पैरों की देखभाल — गद्दियों की नियमित जांच करें

ऊंट के इलाज के लिए हर जगह विशेषज्ञ नहीं मिलते। पशुपालन विभाग या राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केंद्र से संपर्क बनाए रखना उपयोगी रहता है।

सरकारी संरक्षण

राज्य सरकार ऊंट संरक्षण के लिए समय-समय पर योजनाएं चलाती रही है, जिनमें ऊंटनी के बच्चे के जन्म पर पशुपालक को आर्थिक सहायता देने जैसे प्रावधान शामिल रहे हैं।

इन योजनाओं के नाम, राशि और शर्तें बदलती रहती हैं। मौजूदा स्थिति के लिए ज़िला पशुपालन विभाग कार्यालय से संपर्क करना सबसे भरोसेमंद रहेगा।

आगे का रास्ता

ऊंट को बचाने का भावनात्मक तर्क अपनी जगह है, लेकिन टिकाऊ रास्ता सिर्फ़ एक है — ऊंट पालन को फिर से कमाई का ज़रिया बनाना।

इसके तीन व्यावहारिक हिस्से हैं:

  1. दूध का संगठित बाज़ार — संग्रहण केंद्र, प्रसंस्करण इकाई और पशुपालकों के समूह
  2. पर्यटन से जोड़ना — ऊंट सफ़ारी और ग्रामीण पर्यटन कुछ इलाक़ों में अच्छी आमदनी दे रहा है
  3. चराई की ज़मीन का संरक्षण — गोचर और ओरण की ज़मीनें बचाए बिना ऊंट पालन संभव नहीं

जहां ये तीनों जुड़े हैं, वहां ऊंट पालन आज भी चल रहा है। जहां नहीं जुड़े, वहां संख्या घटती जा रही है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

राजस्थान में ऊंटों की संख्या क्यों घट रही है?

मुख्य वजह है परिवहन और खेती में ऊंट की उपयोगिता का घटना। ट्रैक्टर और गाड़ियों के आने से ऊंट की पारंपरिक भूमिका ख़त्म हो गई, जबकि उसके रखरखाव का ख़र्च बना रहा। साथ ही चराई की खुली ज़मीन भी लगातार घटी है।

ऊंटनी का दूध ख़ास क्यों माना जाता है?

ऊंटनी के दूध की संरचना गाय के दूध से अलग होती है और इसे पचाने में अपेक्षाकृत आसान माना जाता है। इसकी बढ़ती मांग की वजह से यह अब सूखे पाउडर, चॉकलेट और साबुन जैसे उत्पादों में भी इस्तेमाल हो रहा है।

बीकानेर में ऊंट से जुड़ा शोध कहां होता है?

बीकानेर में राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केंद्र स्थित है, जो ऊंट की नस्लों, उनके स्वास्थ्य और ऊंटनी के दूध पर शोध करता है। यह देश का प्रमुख संस्थान है।

संवाददाता

मोहनलाल गोदारा

मोहनलाल गोदारा पशुपालन और डेयरी क्षेत्र पर रिपोर्टिंग करते हैं। राठी गाय, ऊंट पालन और दुग्ध सहकारी समितियों पर इनके लेख किसानों के बीच पढ़े जाते हैं। वे नोखा, बीकानेर से हैं।

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