बीकानेर संभाग की खेती को दो हिस्सों में बांटकर देखना पड़ता है — नहर आने से पहले, और नहर आने के बाद।
पहले यहां खेती पूरी तरह बारिश के भरोसे थी। बाजरा, मोठ, ग्वार, मूंग — यही फसलें हो सकती थीं, और वह भी तब जब मानसून साथ दे। इंदिरा गांधी नहर परियोजना ने इस तस्वीर को बदल दिया।
परियोजना क्या है
यह नहर पंजाब में सतलुज और व्यास नदियों के संगम पर बने हरिके बैराज से निकलती है और राजस्थान के उत्तर-पश्चिमी रेगिस्तानी इलाक़ों तक पानी पहुंचाती है।
इसका मक़सद साफ़ था — थार के उस हिस्से तक पानी पहुंचाना जहां खेती लगभग असंभव थी। परियोजना दो चरणों में बनी और इसका लाभ श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, बीकानेर, चूरू, जैसलमेर, बाड़मेर और जोधपुर के हिस्सों तक पहुंचा।
खेती में क्या बदला
नहर आने के बाद सबसे बड़ा बदलाव यह हुआ कि रबी की फसल संभव हो गई।
| पहले | नहर के बाद |
|---|---|
| सिर्फ़ खरीफ, वह भी बारिश पर निर्भर | खरीफ और रबी, दोनों |
| बाजरा, मोठ, ग्वार, मूंग | गेहूं, सरसों, चना, मूंगफली, कपास |
| पैदावार अनिश्चित | अपेक्षाकृत स्थिर |
| नक़दी फसल सीमित | नक़दी फसलों का विकल्प |
इसके साथ जुड़े दूसरे बदलाव भी आए — मंडियों में आवक बढ़ी, कृषि आधारित छोटे उद्योग खड़े हुए, और कई इलाक़ों में आबादी बसी।
बारी व्यवस्था को समझिए
नहरी पानी सबको एक साथ नहीं मिलता। बारी (वारबंदी) व्यवस्था के तहत हर किसान को तय समय पर, तय अवधि के लिए पानी मिलता है।
इसका व्यावहारिक मतलब यह है कि पानी आपकी सुविधा से नहीं, अपने समय पर आएगा। इसलिए:
- अपनी बारी का समय पहले से पता रखें
- बारी से पहले खेत तैयार रखें — नालियां साफ़, मेड़ें दुरुस्त
- फसल का चुनाव और बुवाई का समय बारी के हिसाब से तय करें
- पानी आने पर उसका पूरा इस्तेमाल करें, एक बूंद बर्बाद न जाए
- खेत समतल हो, ताकि पानी हर हिस्से में बराबर पहुंचे
खेत का समतल न होना नहरी इलाक़े में पानी की सबसे बड़ी बर्बादी की वजह है। ऊंचे हिस्से सूखे रह जाते हैं और नीचे वाले हिस्सों में पानी जमा हो जाता है — दोनों ही नुक़सानदेह।
सेम — नहर के साथ आई समस्या
यह सबसे गंभीर मुद्दा है और इस पर खुलकर बात होनी चाहिए।
जहां लगातार ज़्यादा सिंचाई होती रही, वहां भूजल का स्तर ऊपर उठ गया। पानी खेत की सतह के पास जमा होने लगा। जब यह पानी वाष्पित होता है, तो अपने साथ लाए गए लवण मिट्टी की ऊपरी सतह पर छोड़ जाता है।
नतीजा — ज़मीन में सफ़ेद पपड़ी जम जाती है और वह खेती लायक नहीं रहती। इसे सेम कहते हैं।
सेम के शुरुआती संकेत
- खेत में पानी देर तक भरा रहना
- मिट्टी की सतह पर सफ़ेद या भूरी पपड़ी
- फसल का पीला पड़ना और बढ़वार रुक जाना
- खेत के कुछ हिस्सों में फसल का बिल्कुल न उगना
बचाव के उपाय
- ज़रूरत से ज़्यादा सिंचाई न करें। यह सबसे अहम बात है। “ज़्यादा पानी यानी ज़्यादा पैदावार” सोच ही सेम की जड़ है
- सूक्ष्म सिंचाई अपनाएं — ड्रिप और स्प्रिंकलर से पानी जड़ों तक सीमित रहता है और भूजल ऊपर नहीं उठता
- जल निकासी नालियां बनवाएं और उन्हें साफ़ रखें
- यूकेलिप्टस जैसे पानी सोखने वाले पेड़ खेत की मेड़ पर लगाएं
- जिप्सम का इस्तेमाल क्षारीय मिट्टी सुधारने में मदद करता है — मात्रा मिट्टी जांच के आधार पर तय करें
- सेम सहनशील फसलें चुनें — जौ और सरसों गेहूं के मुक़ाबले बेहतर टिकते हैं
सेम प्रभावित ज़मीन के सुधार के लिए कृषि विभाग और भूमि सुधार से जुड़ी योजनाएं समय-समय पर चलती रहती हैं। ज़िला कृषि कार्यालय से जानकारी ली जा सकती है।
पानी का सही इस्तेमाल — आगे का रास्ता
नहर का पानी सीमित है और उस पर दावेदार बढ़ते जा रहे हैं। इसलिए भविष्य इसी बात पर टिका है कि उपलब्ध पानी से ज़्यादा उत्पादन कैसे लिया जाए।
- फसल का चुनाव सोच-समझकर करें। ज़्यादा पानी मांगने वाली फसल हर जगह उपयुक्त नहीं
- सूक्ष्म सिंचाई अपनाएं — यह अब विकल्प नहीं, ज़रूरत है
- खेत समतल करवाएं — लेज़र लेवलिंग से पानी की बड़ी बचत होती है
- खेत तलाई बनवाएं — बारिश का पानी जमा करके बारी के बीच के अंतराल में काम लिया जा सकता है
- मल्चिंग करें — ज़मीन ढकी रहने से नमी कम उड़ती है
एक संतुलित नज़र
नहर ने इस इलाक़े को बहुत कुछ दिया — इसमें कोई दो राय नहीं। जहां खेती असंभव थी, वहां आज दो फसलें हो रही हैं।
लेकिन नहर के साथ आई ज़िम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है। पानी अनंत नहीं है, और ज़्यादा पानी हमेशा ज़्यादा पैदावार नहीं देता। जिन इलाक़ों में यह बात समय रहते समझी गई, वहां ज़मीन आज भी उपजाऊ है। जहां नहीं समझी गई, वहां सेम की सफ़ेद पपड़ी इसका सबूत है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
इंदिरा गांधी नहर का पानी कहां से आता है?
यह नहर पंजाब में सतलुज और व्यास नदियों के संगम पर बने हरिके बैराज से निकलती है और राजस्थान के उत्तर-पश्चिमी रेगिस्तानी ज़िलों तक पानी पहुंचाती है।
सेम की समस्या क्या है?
लगातार ज़्यादा सिंचाई से भूजल का स्तर ऊपर उठ जाता है और खेत की सतह के पास पानी जमा होने लगता है। इससे मिट्टी में लवण जमा हो जाते हैं और ज़मीन खेती लायक नहीं रहती।
नहरी पानी की बारी में सबसे ज़रूरी बात क्या है?
अपनी बारी का समय पहले से जानकर खेत और फसल को तैयार रखना, ताकि पानी आने पर उसका पूरा इस्तेमाल हो सके और वह बर्बाद न जाए।